Justice Sachin Datta ने दिया व्यापक ढांचा — De-indexing और Masking Protocol से संतुलित होगा व्यक्तिगत गरिमा और सार्वजनिक हित का टकराव
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में ‘Right to be Forgotten’ (भुलाए जाने का अधिकार) को संविधान के Article 21 के तहत निजता के अधिकार का एक अभिन्न अंग मान्यता दी है। यह निर्णय डिजिटल युग में व्यक्तिगत गरिमा की रक्षा की दिशा में एक मील का पत्थर है — जहां इंटरनेट पर दर्ज अतीत की जानकारियां व्यक्ति के वर्तमान और भविष्य को स्थायी रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
Right to be Forgotten क्या है?
- Right to be Forgotten (RTBF) किसी व्यक्ति का वह अधिकार है जिसके तहत वह विशेष परिस्थितियों में अपनी व्यक्तिगत जानकारी — जैसे पुराने आपराधिक रिकॉर्ड या निजी विवाद — को इंटरनेट खोजों और अन्य सार्वजनिक प्लेटफॉर्म से हटवा सकता है।
- यह अधिकार informational self-determination के सिद्धांत पर आधारित है — यह मानते हुए कि जब कोई जानकारी अब प्रासंगिक नहीं रही या जब उस जानकारी को जानने में सार्वजनिक हित, व्यक्ति के गरिमा और प्रतिष्ठा के अधिकार से कम हो जाए — तो उसे हटाया जाना चाहिए।
ऐतिहासिक विकास
- यूरोपीय उद्गम: यह अवधारणा 2014 में European Court of Justice के Google Spain v. AEPD निर्णय के बाद वैश्विक स्तर पर प्रमुखता से उभरी। इस निर्णय में कहा गया कि search engines को ऐसे links हटाने होंगे जो किसी व्यक्ति के बारे में अपर्याप्त, अप्रासंगिक या अत्यधिक जानकारी प्रदान करते हों। अब यह EU के General Data Protection Regulation (GDPR) में संहिताबद्ध है।
- भारतीय संदर्भ: भारतीय संविधान में RTBF का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के 2017 के K.S. Puttaswamy निर्णय ने निजता को एक मौलिक अधिकार घोषित किया — जिसने RTBF के लिए आधार तैयार किया।
- विधायी स्थिति: Digital Personal Data Protection (DPDP) Act, 2023 में व्यक्तिगत डेटा के सुधार, पूर्णता और erasure के प्रावधान शामिल हैं — जो भारत में इस अधिकार को वैधानिक आधार प्रदान करते हैं।
दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला
Justice Sachin Datta ने व्यक्तिगत गरिमा और सार्वजनिक जानने के अधिकार के बीच संतुलन बनाने के लिए एक व्यापक ढांचा प्रस्तुत किया —
- De-indexing Mandate: प्लेटफॉर्म को विशेष मामलों के लिए नाम-आधारित खोज कार्यक्षमता को निष्क्रिय करना होगा। इसका अर्थ है कि न्यायिक निर्णय ऑनलाइन तो रहेगा लेकिन व्यक्ति का नाम search करने पर नहीं मिलेगा।
- राहत का दायरा: सुरक्षा मुख्य रूप से तीन श्रेणियों को मिलेगी — आपराधिक आरोपों से बरी व्यक्ति, वैवाहिक या निजी दीवानी विवादों में शामिल पक्ष, और ऐसे व्यक्ति जिनके नाम संयोगवश किसी रिकॉर्ड में आ गए हों जबकि वे उस मामले के पक्षकार नहीं थे।
- Masking Protocol: न्यायालय ने आदेश दिया कि व्यक्तिगत पहचानकर्ता जैसे नाम और पते को masked/redacted किया जाए — जबकि निर्णय का कानूनी तर्क और निष्कर्ष न्यायिक पारदर्शिता के लिए सार्वजनिक रहेंगे। यह पूर्ण विलोपन और पूर्ण प्रकटीकरण के बीच का संतुलित रास्ता है।
- Intermediary की जिम्मेदारी: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि search engines स्वचालित algorithms के माध्यम से काम करते हैं और किसी व्यक्ति के मौलिक सूचनात्मक निजता अधिकार को override नहीं कर सकते। IT Rules 2021 के तहत वे ऐसे removal orders का पालन करने के लिए बाध्य हैं।
महत्व
- डिजिटल कलंक से सुरक्षा: यह निर्णय digital stigmatization को रोकता है — जहां न्यायालय द्वारा बरी होने के बाद भी व्यक्ति को पुराने कानूनी मामलों के कारण आजीवन व्यावसायिक या सामाजिक पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता था।
- डिजिटल युग की वास्तविकता की मान्यता: यह निर्णय स्वीकार करता है कि जहां रिकॉर्ड virtually अमिट हैं वहां कानून को इतना विकसित होना चाहिए कि अतीत का डेटा किसी व्यक्ति के भविष्य को हमेशा के लिए न सताए।
- संतुलित दृष्टिकोण: पूर्ण deletion की जगह masking की वकालत करके न्यायालय ने सुनिश्चित किया कि कानून शोध और न्यायिक मिसाल के लिए सुलभ रहे — लेकिन व्यक्तिगत उत्पीड़न का साधन न बने।
- DPDP Act 2023 से तालमेल: यह निर्णय DPDP Act के erasure प्रावधानों को न्यायिक समर्थन देता है और भविष्य में इसके rules बनाने में दिशा-निर्देश का काम करेगा।
स्रोत: Economic Times | दिल्ली उच्च न्यायालय
