
गुजरात और महाराष्ट्र की सफलता से सीख — Town Planning Schemes बन रही हैं शहरी बुनियादी ढांचे की नई उम्मीद
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राजस्थान ने हाल ही में राज्य की पहली भूमि पूलिंग योजना की घोषणा की है। सरकार को उम्मीद है कि यह योजना भूमि अधिग्रहण की समस्याओं को सुलझाने और सड़कों, बुनियादी ढांचे एवं विकास गतिविधियों के लिए आवश्यक भूमि उपलब्ध कराने में मदद करेगी।
भूमि अधिग्रहण की समस्या
- भारत में शहरी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं ऐतिहासिक रूप से भूमि अधिग्रहण पर निर्भर रही हैं। यह प्रक्रिया विशेष रूप से भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के लागू होने के बाद और अधिक जटिल और वित्तीय रूप से बोझिल हो गई है।
- पुनर्वास प्रावधानों से वित्तीय दायित्व बढ़ गए हैं जिससे बड़े पैमाने पर अधिग्रहण तेजी से अव्यवहार्य हो रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप नियोजित बुनियादी ढांचे और उसके कार्यान्वयन के बीच बढ़ता अंतर देखने को मिल रहा है।
भूमि पूलिंग — एक व्यवहार्य विकल्प
- भूमि पूलिंग मॉडल में भूखंड मालिक स्वेच्छा से बुनियादी ढांचा विकास के लिए भूमि का योगदान करते हैं और बदले में serviced land का एक हिस्सा प्राप्त करते हैं। यह विधि अनिवार्य अधिग्रहण की आवश्यकता को कम करती है और विकास के लाभों को सभी हितधारकों में वितरित करती है।
Town Planning (TP) Scheme — भारत का सबसे सफल मॉडल
- गुजरात और महाराष्ट्र में व्यापक रूप से लागू TP Scheme भारत के सबसे सफल भूमि पूलिंग मॉडलों में से एक है।
- इस मॉडल में भूखंड मालिक स्वेच्छा से अपनी 25-40% भूमि सड़कों, पार्कों, सार्वजनिक सुविधाओं और EWS आवास जैसे बुनियादी ढांचे के लिए योगदान करते हैं। शेष 60-75% भूमि उन्हें बेहतर आकार, सुविधाओं से युक्त और अधिक मूल्यवान reconstituted plots के रूप में वापस मिलती है।
- प्रमुख ताकत: यह participatory और people-centric है। यह financially self-sustaining भी है क्योंकि landowners से incremental charges विकास के दौरान वसूले जाते हैं — अग्रिम नहीं।
राज्यवार अनुभव
- गुजरात: भूमि पूलिंग लगभग 100 वर्ष पहले शुरू हुई और Gujarat Town Planning and Urban Development Act, 1976 के तहत औपचारिक रूप दी गई। अहमदाबाद, सूरत, राजकोट, वडोदरा और गांधीनगर में 1,000 वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र TP schemes के माध्यम से नियोजित हो चुका है।
- महाराष्ट्र: गुजरात के विपरीत महाराष्ट्र TP schemes के लिए अपने statutory provisions को समय पर update करने में विफल रहा। हालांकि पुणे और MMRDA ने हाल ही में शहर के peripheral areas में इस मॉडल को फिर से अपनाया है।
- गुवाहाटी: Guwahati Metropolitan Development Authority Act, 1985 में प्रावधान थे लेकिन भूमि appropriation के प्रतिशत और संस्थागत भूमिकाओं पर स्पष्टता का अभाव था। Digitised land records नहीं थे — records manually maintained थे। समाधान के रूप में joint measurement surveys के बजाय existing map को as-is बनाए रखा और final plot allocations revenue records पर आधारित किए। Private landowners से केवल 12-15% भूमि योगदान मांगा गया जो सामान्य 35-45% से बहुत कम है।
- राजस्थान: 2016 से statutory provisions में भूमि पूलिंग को मान्यता थी लेकिन अनुभव का अभाव था। अब land-value calculations में संशोधन किए जा रहे हैं और सरकार ने लागत का एक हिस्सा स्वयं वहन किया है।
आगे की राह
- तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्य जो अब भूमि पूलिंग अपनाने की सोच रहे हैं उनके सामने पहले भूखंड मालिकों को योजना के लाभ समझाने की चुनौती है। भूमि पूलिंग की सफलता तीन कारकों पर निर्भर करेगी — स्पष्ट legislation, समायोजित land-contribution mechanisms और equitable financial models।
महत्व
- भूमि पूलिंग केवल एक वैकल्पिक land assembly mechanism नहीं है — यह शहरी विकास की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को बदलने का प्रयास है। जहां compulsory acquisition displacement और विरोध पैदा करता है, वहीं TP schemes landowners को विकास के भागीदार बनाती हैं।
- गुजरात का 100 साल का अनुभव दर्शाता है कि सही institutional framework और local innovation के साथ यह मॉडल शहरी India के बुनियादी ढांचे की समस्याओं का टिकाऊ समाधान बन सकता है।
स्रोत: The Hindu | शहरी विकास मंत्रालय | Gujarat Town Planning and Urban Development Act, 1976
