
IISc बेंगलुरु की अगुवाई में तैयार रिपोर्ट PSA कार्यालय को सौंपी — uncalibrated imported equipment से गलत डेटा, भारतीय विज्ञान की विश्वसनीयता पर सवाल
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भारत के अग्रणी जलवायु वैज्ञानिकों ने एक गंभीर चेतावनी दी है — देश ने अपने वैज्ञानिक उपकरण स्वयं बनाने की क्षमता लगभग खो दी है। इसके परिणामस्वरूप जलवायु अवलोकन आयातित उपकरणों पर निर्भर हो गया है जो अक्सर वर्षों तक बिना calibration के चलते रहते हैं। यह चेतावनी Mega Science Vision-2035 (MSV) रिपोर्ट के जलवायु अनुसंधान खंड में दी गई है।
MSV रिपोर्ट क्या है?
- यह भारतीय जलवायु अनुसंधान समुदाय द्वारा तैयार एक road map है जिसमें Indian Institute of Science (IISc), बेंगलुरु नोडल संस्था के रूप में कार्यरत है। इसे भारत सरकार के Principal Scientific Adviser (PSA) के कार्यालय — प्रोफेसर Ajay K. Sood की अगुवाई में — को सौंपा गया है।
- MSV exercise ऐतिहासिक रूप से परमाणु और उच्च-ऊर्जा भौतिकी जैसे क्षेत्रों में बड़ी, दीर्घकालिक परियोजनाओं की योजना बनाने के लिए उपयोग की जाती रही है। पहली बार इसे जलवायु अनुसंधान, पारिस्थितिकी और खगोल विज्ञान तक विस्तारित किया गया है।
प्रमुख चिंताएं
1. वैज्ञानिक उपकरण निर्माण क्षमता का ह्रास
रिपोर्ट में कहा गया है कि uncalibrated imported equipment से “राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में गलत डेटा रिपोर्ट किया जा रहा है जिससे भारतीय विज्ञान की विश्वसनीयता पर अक्सर सवाल उठते हैं।”
- Atmanirbhar Bharat से विरोधाभास: यह चेतावनी सरकार की Atmanirbhar नीति के साथ एक असहज स्थिति पैदा करती है। Government e-Marketplace (GeM) portal को सार्वजनिक वैज्ञानिक संस्थानों के लिए अनिवार्य किए जाने से वैज्ञानिकों को customized, उच्च-गुणवत्ता वाले उपकरण प्राप्त करने में कठिनाई हुई। GeM vendors अक्सर इन specifications को पूरा नहीं कर सके। जून 2025 में वित्त मंत्रालय ने sub-standard materials की शिकायतों के बाद कुछ नियमों में ढील दी।
2. नवीकरणीय ऊर्जा के दीर्घकालिक जलवायु प्रभाव
रिपोर्ट ने बड़े सौर और पवन संयंत्रों के जलवायु पर प्रभावों को “poorly understood” बताते हुए प्राकृतिक संसाधनों के “uncontrolled” दोहन के दीर्घकालिक जलवायु परिणामों का मूल्यांकन करने की आवश्यकता पर जोर दिया। वैज्ञानिकों का यह दृष्टिकोण सतर्कतापूर्ण है, संशयपूर्ण नहीं — वे नवीकरणीय ऊर्जा के विरोधी नहीं हैं बल्कि इसके वैज्ञानिक अध्ययन की मांग कर रहे हैं।
रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें
- Carbon की सामाजिक लागत: CO2 के एक अतिरिक्त टन से होने वाले नुकसान की गणना के लिए वैज्ञानिक तरीके विकसित करना और “polluter pays” सिद्धांत को लागू करने का तंत्र।
- स्वदेशी Earth System Model: मौजूदा भारतीय models जो “अमेरिका या यूरोप से अनुकूलित” हैं, उनसे अलग “first principles” से एक indigenous Earth System Model का निर्माण।
- आठ Mega Projects: 2035 तक तीन पांच-वर्षीय चरणों में observatories, satellites, in-situ networks, field campaigns, indigenous sensors, carbon-neutrality research और adaptation science को शामिल करते हुए।
महत्व
यह रिपोर्ट कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला, भारत पहले से ही intensifying heatwaves, erratic monsoons और Himalayan glacier melt जैसे जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों का सामना कर रहा है — और इन्हीं trends को track करने के लिए reliable, well-calibrated observations की आवश्यकता है। दूसरा, 2030 तक 500 GW non-fossil capacity के लक्ष्य के साथ नवीकरणीय ऊर्जा के दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन और भी जरूरी हो जाता है। तीसरा, indigenous scientific instrument manufacturing की क्षमता का पुनर्निर्माण Atmanirbhar Bharat के वास्तविक अर्थ में एक अनिवार्य कदम है।
स्रोत: The Hindu | Mega Science Vision-2035 Report | IISc Bengaluru | PSA Office