महिला आरक्षण क्यों अब और इंतज़ार नहीं कर सकता?

महिला आरक्षण क्यों अब और इंतज़ार नहीं कर सकता?

अप्रैल 2026 में 131वें संविधान संशोधन विधेयक के पारित न हो पाने के बाद भारत में महिला आरक्षण को तुरंत लागू करने की बहस एक बार फिर तेज हो गई है। यह मुद्दा मुख्य रूप से प्रतिनिधित्व की कमी से जुड़ा है, जहाँ एक ओर महिलाएँ मतदान में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं, वहीं दूसरी ओर कानून बनाने वाली संस्थाओं में उनकी उपस्थिति बेहद सीमित है। यह स्थिति इस बात को दर्शाती है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह से योग्यता आधारित नहीं है, बल्कि सामाजिक नेटवर्क और संसाधनों पर निर्भर है, जिससे महिलाएँ पीछे रह जाती हैं।

यदि हम आँकड़ों पर नजर डालें, तो संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल लगभग 14 से 15 प्रतिशत है, जबकि राज्य विधानसभाओं में यह औसतन 9 प्रतिशत के आसपास है, जबकि महिलाओं की आबादी लगभग 50 प्रतिशत है। इसके विपरीत, कई राज्यों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों के बराबर या उससे अधिक हो चुका है, जो उनकी राजनीतिक जागरूकता को दर्शाता है। पंचायती राज संस्थाओं में 33 से 50 प्रतिशत आरक्षण के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं, जहाँ महिला प्रतिनिधियों ने स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी और स्वच्छता जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी है। वैश्विक स्तर पर भी भारत का महिला प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम है, जो लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप नहीं है।

महिला आरक्षण को और अधिक समय तक टालना कई कारणों से उचित नहीं है। सबसे पहले, यह एक संरचनात्मक समस्या है, जिसे केवल कानूनी प्रावधानों के माध्यम से ही ठीक किया जा सकता है, क्योंकि राजनीतिक दल स्वेच्छा से महिलाओं को पर्याप्त अवसर नहीं देते। इसके अलावा, महिला नेतृत्व नीतियों की प्राथमिकताओं में सकारात्मक बदलाव लाता है और मानव विकास से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है। साथ ही, जब महिलाएँ नेतृत्व की भूमिका में दिखाई देती हैं, तो इससे सामाजिक सोच में परिवर्तन आता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। एक सशक्त लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व हो, अन्यथा उसकी वैधता और समावेशिता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। वर्तमान समय में जब महिलाएँ शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रही हैं, तब उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित रखना उनकी बढ़ती आकांक्षाओं के विपरीत है।

साल 2023 में पारित 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाता है, महिला आरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके तहत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है, जिसे 15 वर्षों के लिए लागू किया जाना है। इस अधिनियम में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए उप-आरक्षण भी शामिल है। हालांकि, इसका कार्यान्वयन जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया है, जिसके कारण इसमें देरी हो रही है, और यही सबसे बड़ा विवाद का विषय है।

महिला आरक्षण को लागू करने में देरी के कई नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं। इससे प्रतिनिधित्व की कमी और बढ़ेगी तथा 2029 के आम चुनावों में भी महिलाओं की भागीदारी सीमित रह सकती है। राजनीतिक दलों का पुरुष वर्चस्व बना रहेगा और महिलाओं को टिकट देने में भेदभाव जारी रहेगा। इसके अलावा, नीतियों में महिला दृष्टिकोण की कमी बनी रहेगी, जिससे कई महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे नजरअंदाज हो सकते हैं। लोकतंत्र की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी, क्योंकि महिलाएँ केवल मतदाता बनकर रह जाएँगी, न कि निर्णय लेने वाली भूमिका में आ पाएँगी। आर्थिक दृष्टि से भी यह नुकसानदायक है, क्योंकि शोध बताते हैं कि महिला भागीदारी से विकास अधिक समावेशी और प्रभावी होता है।

आगे का रास्ता यह है कि महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग करके जल्द से जल्द लागू किया जाए। इसके साथ ही स्वयं सहायता समूहों और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से महिलाओं को राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। राजनीतिक दलों को भी अपने स्तर पर महिलाओं के लिए टिकट वितरण में आरक्षण लागू करना चाहिए। इसके अलावा, महिलाओं को चुनाव लड़ने के लिए वित्तीय और संस्थागत सहायता प्रदान की जानी चाहिए तथा समाज में इस विषय पर व्यापक जागरूकता फैलाई जानी चाहिए।

अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत का लोकतंत्र तब तक पूर्ण नहीं हो सकता जब तक महिलाएँ केवल मतदान तक सीमित रहें और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी समान भागीदारी न हो। महिला आरक्षण को तुरंत लागू करना केवल समानता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक मजबूत, समावेशी और प्रतिनिधिक लोकतंत्र की दिशा में एक आवश्यक कदम है।