Babu Veer Kunwar Singh, Veer Kunwar Singh Jayanti, Vijay Diwas April 23,
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स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह जी को उनके विजय दिवस (23 अप्रैल) शत्-शत् नमन

EXAM RELAVANCE
प्रारंभिक परीक्षा (PT)मुख्य परीक्षा (MAINS)
राष्ट्रीय मह:त्व की समसामयिक घटनाएँGS Paper 1: स्वतंत्रता संग्राम  
टॉपिक के संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न – प्रश्न : 1857 के विद्रोह में बाबू वीर कुंवर सिंह की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। (150 शब्द) प्रश्न : बाबू वीर कुंवर सिंह को 1857 के विद्रोह का ‘अमर नायक’ क्यों कहा जाता है? (150 शब्द)प्रश्न : “गोरिल्ला युद्ध रणनीति ने 1857 के विद्रोह को लंबा खींचने में मदद की।” बाबू वीर कुंवर सिंह के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए। (250 शब्द)
  • 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, जगदीशपुर के बाबू वीर कुंवर सिंह जी की जयंती (13 नवंबर, 1777 – जन्म) और उनके विजय दिवस (23 अप्रैल, 1858) पर उन्हें शत्-शत् नमन।
  • बाबू वीर कुंवर सिंह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानायक थे।
  • वे जगदीशपुर (आरा, बिहार) के राजपूत जमींदार थे।
  • 1857 के विद्रोह में बिहार क्षेत्र के सबसे प्रभावी सैन्य नेता माने जाते हैं।
  • जन्म: 13 नवंबर 1777
  • विजय दिवस: 23 अप्रैल 1858
  • मृत्यु: 26 अप्रैल 1858
  • विद्रोह के दौरान उन्होंने आरा और जगदीशपुर को विद्रोह का केंद्र बनाया।
  • अंग्रेजों के खिलाफ उन्होंने बिहार से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक संघर्ष किया।
  • उन्होंने ब्रिटिश सेना को कई बार पराजित किया और लंबे समय तक संघर्ष जारी रखा।
  • 23 अप्रैल 1858 को उन्होंने जगदीशपुर किले पर पुनः कब्जा किया।
  • यूनियन जैक उतारकर अपना ध्वज फहराया।
  • यह दिन बिहार में “विजयोत्सव” के रूप में मनाया जाता है।
  • वे गोरिल्ला युद्ध (Guerrilla Warfare) में निपुण थे।
  • कम संसाधनों के बावजूद मोबाइल युद्ध रणनीति अपनाकर अंग्रेजों को लगातार चुनौती दी।
  • उन्होंने लगभग 80 वर्ष की उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया।
  • घायल होने पर उन्होंने अपना हाथ काटकर गंगा को समर्पित कर दिया (लोकप्रचलित घटना)।
  • उन्हें 1857 के विद्रोह का “अमर नायक” कहा जाता है।
  • बाबू वीर कुंवर सिंह 1857 के विद्रोह में बिहार के सबसे प्रभावशाली सेनानायक थे।
  •  उन्होंने वृद्धावस्था में भी अद्भुत साहस और रणनीति से अंग्रेजों को चुनौती दी तथा जगदीशपुर विजय (23 अप्रैल 1858) ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के महान नायकों में अमर कर दिया।