केयर इकोनॉमी: समावेशी विकास और महिला सशक्तिकरण की नई दिशा

केयर इकोनॉमी: समावेशी विकास और महिला सशक्तिकरण की नई दिशा

संदर्भ

हाल ही में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने केयर इकोनॉमी (Care Economy) पर एक महत्वपूर्ण वर्किंग पेपर जारी किया है। इस रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि “देखभाल” (Care) को केवल परिवारों की निजी जिम्मेदारी न मानकर, एक आवश्यक सामाजिक एवं आर्थिक अवसंरचना (Social and Economic Infrastructure) के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब भारत तेजी से शहरीकरण, वृद्धावस्था, महिला श्रम भागीदारी में कमी और पारिवारिक संरचना में बदलाव जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।

केयर इकोनॉमी क्या है?

केयर इकोनॉमी वह आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था है जिसमें ऐसे सभी कार्य शामिल होते हैं जो लोगों की देखभाल, पोषण, सुरक्षा और जीवन-गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। इसे “पर्पल इकोनॉमी” भी कहा जाता है।

  • सवैतनिक (Paid Care Work)- नर्सिंग सेवाएं, चाइल्डकेयर सेंटर, वृद्धाश्रम, घरेलू सहायिका सेवाएं, दिव्यांग सहायता सेवाएं
  • अवैतनिक (Unpaid Care Work)- घर में बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, भोजन बनाना, घरेलू कार्य, बीमार व्यक्ति की देखभाल

भारत में यह कार्य मुख्यतः महिलाओं द्वारा किया जाता है, लेकिन इसे औपचारिक आर्थिक गतिविधि के रूप में मान्यता नहीं मिलती।

भारत में केयर इकोनॉमी की वर्तमान स्थिति

EAC-PM के अनुसार, भारत में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक घरेलू और देखभाल कार्य का आर्थिक मूल्य देश के GDP के लगभग 15-17% के बराबर हो सकता है। यह दर्शाता है कि केयर कार्य वास्तव में अर्थव्यवस्था की “अदृश्य रीढ़” (Invisible Backbone) है।

भारत में महिलाएं प्रतिदिन लगभग 289 मिनट घरेलू एवं देखभाल कार्य में बिताती हैं, जबकि पुरुष केवल 88 मिनट

इस असमानता के कारण:

  • महिलाओं को रोजगार के कम अवसर मिलते हैं
  • शिक्षा एवं कौशल विकास प्रभावित होता है
  • आर्थिक स्वतंत्रता सीमित होती है
  • कार्यबल में महिला भागीदारी घटती है

इसे ही “Time Poverty” कहा जाता है — यानी महिलाओं के पास स्वयं के विकास के लिए पर्याप्त समय न होना।

EAC-PM की प्रमुख सिफारिशें

1. नवाचारी वित्तपोषण (Innovative Financing)

रिपोर्ट में “परिवार सेवा कोष” स्थापित करने का सुझाव दिया गया है।

उद्देश्य:

  • सामुदायिक देखभाल सेवाओं को वित्तीय सहायता देना
  • स्थानीय स्तर पर चाइल्डकेयर एवं वृद्ध देखभाल केंद्र विकसित करना
  • ग्रामीण और शहरी गरीब परिवारों को सहायता प्रदान करना

“केयरप्रेन्योर” यानी केयर सेक्टर में उद्यम शुरू करने वालों के लिए विशेष फंड की सिफारिश की गई है।

संभावित लाभ:

  • महिला उद्यमिता को बढ़ावा
  • रोजगार सृजन
  • स्थानीय सेवा बाजार का विस्तार

उदाहरण:

  • होम हेल्थकेयर स्टार्टअप
  • डे-केयर सेंटर
  • बुजुर्ग देखभाल सेवाएं

रिपोर्ट में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल को बढ़ावा देने की बात कही गई है।

उदाहरण:

तमिलनाडु का “महिला रोजगार और सुरक्षा कार्यक्रम”, जिसे विश्व बैंक का सहयोग प्राप्त है।

इसका उद्देश्य:

  • कामकाजी महिलाओं के लिए सुरक्षित चाइल्डकेयर सुविधा उपलब्ध कराना
  • महिलाओं की रोजगार भागीदारी बढ़ाना

2. केयर वर्कफोर्स का निर्माण

भारत में प्रशिक्षित देखभाल कर्मियों की भारी कमी है।

रिपोर्ट के अनुसार:

वर्ष 2050 तक भारत को लगभग 3.1–3.8 करोड़ औपचारिक केयर वर्कर्स की आवश्यकता होगी।

इसके लिए सुझाव:

  • स्किल गैप का आकलन
  • प्रमाणित प्रशिक्षण कार्यक्रम
  • राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकरण
  • केयर वर्क को “औपचारिक रोजगार” का दर्जा देना

3. नीतिगत सुधार

रिपोर्ट में केवल मातृत्व अवकाश ही नहीं, बल्कि पितृत्व एवं अभिभावकीय अवकाश (Parental Leave) की भी सिफारिश की गई है।

महत्व:

  • महिलाओं पर देखभाल का बोझ कम होगा
  • पुरुषों की भागीदारी बढ़ेगी
  • कार्यस्थल पर लैंगिक समानता मजबूत होगी

रिपोर्ट के अनुसार, शहरों में:

  • डे-केयर सेंटर
  • वृद्ध देखभाल केंद्र
  • सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाएं

को आवश्यक सामाजिक अवसंरचना का दर्जा मिलना चाहिए।

सिक्किम में निजी क्षेत्र की कामकाजी माताओं को मासिक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

रिपोर्ट ने सुझाव दिया है कि इस मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जा सकता है।

4. अन्य महत्वपूर्ण सुझाव

  • Care Cooperatives को बढ़ावा देना
  • सरकारी स्कूलों में बाल देखभाल केंद्र खोलना
  • गुणवत्ता आश्वासन प्रणाली विकसित करना
  • आशा एवं आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की स्थिति सुधारना

औपचारिक केयर इकोनॉमी विकसित करना क्यों आवश्यक है?

1. रोजगार सृजन

यदि भारत केयर सेक्टर में GDP का केवल 2% निवेश करे, तो लगभग 1.1 करोड़ नए रोजगार पैदा हो सकते हैं।

इनमें अधिकांश अवसर महिलाओं को मिल सकते हैं।

2. वृद्ध होती आबादी

भारत तेजी से वृद्ध समाज की ओर बढ़ रहा है।

अनुमान:

  • 2050 तक बुजुर्ग आबादी 10% से बढ़कर 21% हो जाएगी।
  • बच्चों की हिस्सेदारी 24% से घटकर 18% रह जाएगी।

इससे वृद्ध देखभाल सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ेगी।

3. पारंपरिक परिवार व्यवस्था में बदलाव

पहले संयुक्त परिवार देखभाल का मुख्य आधार थे।

लेकिन अब: शहरीकरण, प्रवासन, एकल परिवार , महिलाओं की कार्यभागीदारी के कारण औपचारिक देखभाल सेवाओं की आवश्यकता बढ़ रही है।

4. अनौपचारिक कार्यबल की समस्याएं

भारत में आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और घरेलू सहायिकाएं केयर इकोनॉमी का आधार हैं। लेकिन इन्हें: कम वेतन, सीमित सामाजिक सुरक्षा, अस्थिर रोजगार, अत्यधिक कार्यभार जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

चुनौतियां

  • वित्तीय बोझ- व्यापक केयर अवसंरचना के लिए भारी सरकारी निवेश की आवश्यकता होगी।
  • सामाजिक मानसिकता- भारत में देखभाल कार्य को अभी भी “महिलाओं का प्राकृतिक दायित्व” माना जाता है।
  • असंगठित क्षेत्र की प्रधानता- केयर सेक्टर का बड़ा हिस्सा अभी भी असंगठित है।
  • गुणवत्ता नियंत्रण – देखभाल सेवाओं में मानकीकरण एवं निगरानी की कमी है।

आगे की राह

  • Care Economy को राष्ट्रीय आर्थिक नीति का हिस्सा बनाया जाए
  • महिला श्रम भागीदारी बढ़ाने हेतु देखभाल सेवाओं का विस्तार हो
  • आशा एवं आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को औपचारिक कर्मचारी का दर्जा मिले
  • स्थानीय निकायों को केयर अवसंरचना विकसित करने की जिम्मेदारी दी जाए
  • Skill India के अंतर्गत Care Skills को प्राथमिकता दी जाए

निष्कर्ष

केयर इकोनॉमी केवल सामाजिक कल्याण का विषय नहीं है, बल्कि यह भारत की भविष्य की अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और मानव विकास का केंद्रीय आधार बन सकती है। यदि भारत इसे औपचारिक आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित करता है, तो यह: रोजगार सृजन, लैंगिक समानता, सामाजिक सुरक्षा, तथा समावेशी विकास को एक साथ आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।