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अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Nature Sustainability में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन ने वन संरक्षण के पारंपरिक दृष्टिकोण को चुनौती देते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि जैव विविधता संरक्षण और गरीबी उन्मूलन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। अध्ययन के अनुसार, यदि स्थानीय समुदायों को बेहतर आजीविका के अवसर उपलब्ध कराए जाएं तो वनों पर निर्भरता कम होगी और वनों की जैव विविधता को अधिक प्रभावी ढंग से संरक्षित किया जा सकेगा।
24 वर्षों के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन
- यह अध्ययन International Forestry Resources and Institutions (IFRI) नेटवर्क के आंकड़ों पर आधारित है। शोधकर्ताओं ने 1993 से 2017 के बीच 15 देशों के 322 सामुदायिक प्रबंधित उष्णकटिबंधीय वनों का विश्लेषण किया।
- अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि मानव आजीविका की स्थिति और वनों की जैव विविधता के बीच किस प्रकार का संबंध मौजूद है। शोध में वृक्ष प्रजातियों की विविधता (Tree Species Diversity) को पारिस्थितिक स्थिरता और वन स्वास्थ्य का प्रमुख संकेतक माना गया।
गरीबी नहीं, विकल्पों की कमी है समस्या
- अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि गरीबी स्वयं जैव विविधता ह्रास का कारण नहीं है। वास्तविक समस्या तब उत्पन्न होती है जब गरीब समुदायों के पास आय के वैकल्पिक साधन नहीं होते और वे अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए वनों पर अत्यधिक निर्भर हो जाते हैं।
- ऐसे क्षेत्रों में ईंधन लकड़ी, चारा तथा अन्य वन संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण वृक्ष प्रजातियों की विविधता घट जाती है, जिससे वन पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर और जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है।
- इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों में लोगों को कृषि, पशुपालन, पर्यटन या अन्य गैर-वन आधारित रोजगार उपलब्ध हैं, वहां वन अधिक स्वस्थ और जैव विविधता से समृद्ध पाए गए।
पारंपरिक ‘फोर्ट्रेस कंजर्वेशन’ मॉडल पर प्रश्न
- अध्ययन ने भारत में लंबे समय से अपनाए जा रहे ‘Fortress Conservation Model’ पर भी सवाल उठाए हैं। इस मॉडल में वन्यजीव अभयारण्यों और संरक्षित क्षेत्रों में मानव गतिविधियों को सीमित कर संरक्षण का प्रयास किया जाता है।
- हालांकि इस नीति ने कुछ प्रमुख वन्यजीव प्रजातियों के संरक्षण में सफलता दिलाई है, लेकिन कई संरक्षित क्षेत्र अब मानव बस्तियों से घिरे पृथक पारिस्थितिक द्वीप (Ecological Islands) बनते जा रहे हैं। इससे वन्यजीव गलियारों (Wildlife Corridors) और वन संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है।
- विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में लगभग 27.5 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वन संसाधनों पर निर्भर हैं। ऐसे में केवल प्रतिबंध आधारित संरक्षण रणनीति दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकती।
सामुदायिक संरक्षण की सफल पहलें
देश के विभिन्न भागों में समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं।
- अरुणाचल प्रदेश का हॉर्नबिल संरक्षण कार्यक्रम– नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन द्वारा संचालित इस कार्यक्रम में पूर्व शिकारी समुदायों को हॉर्नबिल पक्षियों के घोंसलों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया है। इससे शिकार में कमी आई है और वन संरक्षण को बढ़ावा मिला है।
- महाराष्ट्र के मैंग्रोव संरक्षण समूह– सिंधुदुर्ग जिले में स्थानीय समुदाय मैंग्रोव संरक्षण के साथ-साथ मत्स्य पालन, जलीय कृषि और पारिस्थितिक पर्यटन से आय अर्जित कर रहे हैं।
- लद्दाख में हिम तेंदुआ संरक्षण– सामुदायिक होम-स्टे और पशुधन बीमा योजनाओं के माध्यम से मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में सफलता मिली है।
- स्वच्छ ऊर्जा वितरण– कई राज्यों में वन क्षेत्रों के आसपास एलपीजी कनेक्शन, ऊर्जा-कुशल चूल्हे और सौर उपकरण वितरित किए जा रहे हैं, जिससे ईंधन लकड़ी पर निर्भरता कम हुई है।
प्रमुख चुनौतियां
विशेषज्ञों का मानना है कि सामुदायिक वन प्रबंधन को व्यापक स्तर पर लागू करने में कई चुनौतियां मौजूद हैं।
- वैकल्पिक आजीविका कार्यक्रमों के लिए अनियमित वित्तीय सहायता
- स्थानीय समुदायों की भिन्न सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां
- वन पर्यटन से प्राप्त आय का असमान वितरण
- पारंपरिक एवं आदिवासी ज्ञान की उपेक्षा
- संस्थागत समन्वय की कमी
आगे की राह
- विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि वन संरक्षण को ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों से जोड़ा जाना चाहिए।
- वन्यजीव गलियारों में स्वच्छ ऊर्जा योजनाओं का विस्तार, इको-टूरिज्म आय का स्थानीय समुदायों के साथ साझा करना, सामुदायिक अधिकारों को मजबूत करना तथा स्थानीय स्तर पर रोजगार आधारित संरक्षण मॉडल विकसित करना आवश्यक होगा।
निष्कर्ष
Nature Sustainability का यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि गरीबी उन्मूलन और जैव विविधता संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। भारत जैसे देश में, जहां करोड़ों लोग वन संसाधनों पर निर्भर हैं, वहां समावेशी एवं समुदाय-आधारित संरक्षण मॉडल ही दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता और सतत विकास का आधार बन सकते हैं।
