“पितृसत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शक्ति — क्यों महिलाओं को भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था का नेतृत्व करना चाहिए?”

“पितृसत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शक्ति — क्यों महिलाओं को भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था का नेतृत्व करना चाहिए?”

कल्पना कीजिए एक ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था की— जहाँ अस्पताल हैं, योजनाएँ हैं, डॉक्टर हैं… फिर भी आधी आबादी पूरी तरह स्वस्थ नहीं है।

क्योंकि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि सोच की है। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में पितृसत्ता (Patriarchy) एक अदृश्य बाधा बनकर मौजूद है, जो नीति-निर्माण से लेकर जमीनी स्तर तक महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

जब तक महिलाएँ इस व्यवस्था का नेतृत्व नहीं करेंगी, तब तक “समान स्वास्थ्य” केवल एक सपना ही रहेगा।

हम अक्सर बीमारियों का इलाज दवाओं से करते हैं, लेकिन क्या आपने सोचा है कि कुछ बीमारियाँ समाज में छिपी होती हैं?

पितृसत्ता ऐसी ही एक “Silent Disease” है

  • महिलाओं को केवल प्रजनन तक सीमित कर देना
  • उनकी अन्य स्वास्थ्य जरूरतों को नजरअंदाज करना
  • नीति निर्माण में उनकी आवाज को कमजोर करना

यह सब मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाता है, जहाँ महिला “केंद्र” में नहीं, बल्कि “किनारे” पर होती है।

  • लिंगानुपात: 917 लड़कियाँ प्रति 1000 लड़के पर — यह केवल संख्या नहीं, बल्कि समाज की सोच का आईना है
  • पोषण : हर दूसरी महिला एनीमिया से जूझ रही है,  यानी “स्वास्थ्य” अभी भी प्राथमिकता नहीं
  • मातृत्व: कम उम्र में विवाह और गर्भधारण,  जीवन की शुरुआत ही जोखिम से
  • असमानता : एक तरफ केरल, दूसरी तरफ गुजरात भारत में स्वास्थ्य भी “समान” नहीं है
  • नीतियों का नजरिया : महिलाओं को केवल “माँ” तक सीमित कर देना
  • अस्पतालों की हकीकत : लेबर रूम में भी गरिमा का अभाव
  • पंच-पति सिस्टम : जहाँ महिला चुनी जाती है, लेकिन निर्णय पुरुष लेते हैं
  • केंद्रीकरण : स्थानीय जरूरतों को अनदेखा कर “एक जैसा समाधान”

स्वास्थ्य केवल दवाइयों, अस्पतालों या डॉक्टरों का विषय नहीं है— यह पहुँच, स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता से भी जुड़ा है। महिलाओं के लिए यह राह अक्सर आसान नहीं होती, क्योंकि उनके सामने कई ऐसी “अदृश्य दीवारें” खड़ी होती हैं, जो दिखती तो नहीं, पर गहराई से प्रभाव डालती हैं—

  • दूरी और सुरक्षा का डर : अस्पताल तक पहुँचना कई महिलाओं के लिए चुनौती है। लंबी दूरी, खराब परिवहन और असुरक्षा की भावना उन्हें समय पर इलाज लेने से रोकती है।
  • आर्थिक निर्भरता : कई महिलाएँ अपनी कमाई या खर्च का निर्णय खुद नहीं ले पातीं। परिणाम: अपनी बीमारी को भी वे “जरूरी खर्च” नहीं मान पातीं।
  • घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ : घर, बच्चे, बुजुर्ग—सबकी देखभाल पहले, खुद का स्वास्थ्य हमेशा “बाद में”।
  • महिला डॉक्टरों की कमी : ग्रामीण और छोटे शहरों में महिला डॉक्टरों का अभाव,  कई महिलाएँ झिझक के कारण इलाज टाल देती हैं।

यह केवल स्वास्थ्य सेवाओं की कमी नहीं है, बल्कि एक ऐसी सामाजिक संरचना का परिणाम है जहाँ—

  • महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित है
  • उनकी प्राथमिकताएँ तय करने का अधिकार कम है

👉 जो महिलाएँ इस सिस्टम को चलाती हैं,
👉 वही इस सिस्टम में सबसे कम सुनी जाती हैं

  • 10 लाख आशा कार्यकर्ता
  • 28 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता

फिर भी —
❌ न सम्मानजनक वेतन
❌ न निर्णय लेने की शक्ति

  • 1. नेतृत्व में महिलाएँनीति वही बदलेगी, जब नीति बनाने वाले बदलेंगे
  • 2. जमीनी सशक्तिकरणगाँव की महिला, गाँव का निर्णय
  • 3. हर महिला तक योजना “एक साइज फिट्स ऑल” नहीं, बल्कि “इन्क्लूसिव अप्रोच”
  • 4. गरिमा के साथ स्वास्थ्य साफ-सुथरे, सुरक्षित और महिला-अनुकूल अस्पताल
  • 5. कार्यबल का सम्मानआशा और आंगनवाड़ी = “रीढ़”, न कि “स्वयंसेवक”

भारत का स्वास्थ्य सुधार केवल बजट बढ़ाने से नहीं होगा, बल्कि तब होगा जब —

  • महिलाएँ “मरीज” नहीं, बल्कि “निर्णयकर्ता” बनेंगी
  • उनकी आवाज नीति का हिस्सा बनेगी

“अगर स्वास्थ्य व्यवस्था एक शरीर है, तो महिलाएँ उसकी आत्मा हैं — और बिना आत्मा के शरीर जीवित नहीं रह सकता।” अब समय है कि हम महिलाओं को केवल देखभाल करने वाली नहीं, बल्कि नेतृत्व करने वाली शक्ति के रूप में स्वीकार करें।