संदर्भ (Context)
Ministry of Social Justice and Empowerment की 2025-26 रिपोर्ट के अनुसार, राज्यों द्वारा DNT समुदायों के लिए समुदाय प्रमाणपत्र जारी करने और लाभार्थियों की पहचान में गंभीर कमी पाई गई है।
ये कौन हैं? (Who They Are?)
- वे समुदाय जिन्हें औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन ने Criminal Tribes Act, 1871 के तहत “जन्मजात अपराधी” घोषित किया था।
- ये पारंपरिक रूप से घुमंतू या अर्ध-घुमंतू जीवनशैली अपनाते हैं (जैसे व्यापार, पशुपालन, लोक-मनोरंजन)।
- वर्तमान स्थिति:
- 1952 में इस कानून के निरसन के बाद इन्हें “Denotified” किया गया।
- फिर भी कई राज्यों में इन्हें Habitual Offenders Laws के तहत निगरानी में रखा गया।
उत्पत्ति और इतिहास (Origin & History)
- औपनिवेशिक कलंक:
ब्रिटिश शासन ने यह मान्यता दी कि कुछ जातियाँ “जन्म से अपराधी” होती हैं। - निरसन (1952):
स्वतंत्रता के बाद Criminal Tribes Act समाप्त कर इन समुदायों को Denotified Tribes का दर्जा दिया गया। - जनगणना इतिहास:
- 1911–1931 की जनगणनाओं में इनका उल्लेख हुआ।
- 1931 के बाद इनकी अलग गणना बंद हो गई।
क्षेत्रीय विस्तार (Regional Spread)
- पूरे भारत में लगभग 1200 समुदाय इस श्रेणी में आते हैं।
- केवल 7 राज्य ही सक्रिय रूप से DNT प्रमाणपत्र जारी कर रहे हैं।
- लगभग 268 समुदाय किसी भी SC/ST/OBC श्रेणी में शामिल नहीं हैं (Unclassified)।
मुख्य विशेषताएँ (Key Features)
1. सामाजिक हाशियाकरण
- “Denotified” होने के बावजूद सामाजिक कलंक बना हुआ है।
- कई स्थानों पर इन्हें अब भी आदतन अपराधी (habitual offenders) के रूप में देखा जाता है।
2. आर्थिक पिछड़ापन
- ये समुदाय शिक्षा और आय के स्तर पर अत्यंत पिछड़े हैं।
- SEED Scheme for DNTs के तहत कल्याण का प्रयास, लेकिन लाभ कम पहुँचा (पहचान की समस्या के कारण)।
3. पहचान की समस्या (Identity Issues)
- कई DNTs को SC/ST/OBC में गलत तरीके से शामिल किया गया है।
- इससे उनकी विशिष्ट जरूरतें नजरअंदाज हो जाती हैं और वे अन्य समूहों के भीतर भी हाशिए पर चले जाते हैं।
4. प्रमाणपत्र से जुड़ी बाधाएँ
- DNT प्रमाणपत्र का अभाव सबसे बड़ी समस्या है।
- इसके कारण ये लोग Pradhan Mantri Awas Yojana – Gramin (PMAY-G) और अन्य योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते।
महत्व (Significance)
- विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आगामी जनगणना में DNTs की सटीक गणना और पहचान नहीं हुई, तो 10 करोड़ से अधिक लोग नीतिगत लाभ से वंचित रह सकते हैं।
- समुदाय के नेता उनके इतिहास को “अपराध” नहीं बल्कि औपनिवेशिक शासन और बाहरी आक्रमणों के खिलाफ प्रतिरोध के रूप में देखते हैं।
निष्कर्ष
DNTs का मुद्दा केवल सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन का नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय, पहचान संकट और नीतिगत उपेक्षा का भी है। इनके सशक्तिकरण के लिए सटीक पहचान, प्रमाणपत्र वितरण और लक्षित नीतियों की तत्काल आवश्यकता है।

