AI डेटा सेंटरों पर बढ़ता पर्यावरणीय विरोध, दुनिया भर में तेज हुई बहस

Download 15th June current Affairs PDF

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के तेजी से विस्तार के साथ दुनिया भर में विशाल AI डेटा सेंटरों के निर्माण की होड़ तेज हो गई है। हालांकि, इन परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर अमेरिका, यूरोप, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया सहित कई क्षेत्रों में विरोध भी बढ़ता जा रहा है। स्थानीय समुदायों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि AI डेटा सेंटर ऊर्जा, जल और भूमि संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डाल रहे हैं, जिससे पर्यावरण और स्थानीय आबादी दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

क्या हैं AI डेटा सेंटर?

  • AI डेटा सेंटर विशाल हाइपर-स्केल कंप्यूटिंग सुविधाएं हैं, जिन्हें जटिल मशीन लर्निंग और जनरेटिव AI मॉडल को प्रशिक्षित करने तथा संचालित करने के लिए बनाया जाता है।
  • पारंपरिक डेटा सेंटर मुख्यतः डिजिटल सूचनाओं के भंडारण का कार्य करते हैं, जबकि AI डेटा सेंटरों को अरबों गणनाएं प्रति सेकंड करने के लिए लगातार उच्च क्षमता वाली कंप्यूटिंग शक्ति की आवश्यकता होती है।
  • इन्हें आधुनिक युग के “सुपरकंप्यूटर परिसरों” के रूप में देखा जा रहा है, जो AI आधारित सेवाओं की रीढ़ बन चुके हैं।

वैश्विक स्तर पर बढ़ रहा विरोध

  • रिपोर्टों के अनुसार, केवल वर्ष 2025 में अमेरिका में स्थानीय विरोध और जन आंदोलनों के कारण लगभग 152 अरब डॉलर मूल्य की डेटा सेंटर परियोजनाएं विलंबित या अवरुद्ध हुईं।
  • कई समुदायों का मानना है कि इन परियोजनाओं से स्थानीय जल संसाधनों और बिजली नेटवर्क पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है।
  • यूरोप में भी कई बड़े डेटा सेंटर प्रस्तावों को रद्द या पुनर्विचार के लिए रोक दिया गया है। कई देशों ने छोटे, क्षेत्रीय और हरित ऊर्जा आधारित डेटा हब को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है।

भारत में AI अवसंरचना विस्तार की तैयारी

  • भारत भी AI डेटा सेंटरों का वैश्विक केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसी क्रम में Adani Group ने वर्ष 2035 तक 100 अरब डॉलर के निवेश के साथ 5 गीगावॉट AI अवसंरचना प्लेटफॉर्म विकसित करने की योजना की घोषणा की है।
  • इसके अलावा Google और Adani Group की साझेदारी में विशाखापत्तनम में 2 गीगावॉट क्षमता वाला डेटा सेंटर विकसित किया जा रहा है, जिसे देश का सबसे बड़ा हाइपर-स्केल डेटा सेंटर माना जा रहा है।
  • इस परियोजना के लिए लगभग 480 एकड़ भूमि आवंटित की गई है, जो पारिस्थितिक दृष्टि से संवेदनशील तटीय क्षेत्र में स्थित है।

जल और बिजली संसाधनों पर बढ़ता दबाव

  • विशेषज्ञों का कहना है कि AI डेटा सेंटरों की सबसे बड़ी चुनौती उनकी अत्यधिक ऊर्जा और जल खपत है। हजारों सर्वरों को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी और निरंतर बिजली आपूर्ति की आवश्यकता होती है।
  • आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा कुछ बड़ी तकनीकी परियोजनाओं को 15 वर्षों तक बिजली और 10 वर्षों तक जल सब्सिडी प्रदान किए जाने के फैसले ने भी संसाधन वितरण को लेकर बहस को जन्म दिया है।
  • आलोचकों का तर्क है कि इससे स्थानीय समुदायों पर संसाधनों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर बढ़ी चिंता

  • पर्यावरणविदों के अनुसार, तटीय क्षेत्रों, कृषि भूमि और बागानों में बड़े डेटा सेंटर स्थापित करने से भूमि क्षरण, ध्वनि प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण और भूजल संसाधनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • इसके अतिरिक्त, कई परियोजनाओं को पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA) से छूट दिए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि इससे दीर्घकालिक पर्यावरणीय जोखिमों का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता।

वैश्विक और भारतीय दृष्टिकोण में अंतर

  • जहां यूरोपीय संघ और अमेरिका में डेटा सेंटर परियोजनाओं के लिए कठोर पर्यावरणीय मूल्यांकन और संसाधन प्रभाव अध्ययन अनिवार्य किए जा रहे हैं, वहीं भारत में कर छूट, भूमि रियायतें तथा जल और बिजली सब्सिडी जैसी प्रोत्साहन नीतियों के माध्यम से निवेश आकर्षित करने पर अधिक जोर दिया जा रहा है।
  • विशेषज्ञों का कहना है कि AI क्षेत्र में निवेश आवश्यक है, लेकिन पर्यावरणीय स्थिरता और संसाधन संरक्षण को समान महत्व देना भी उतना ही जरूरी है।

संतुलित विकास की आवश्यकता

  • विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि बड़े डेटा सेंटरों के लिए अनिवार्य पर्यावरण प्रभाव आकलन, जल पुनर्चक्रण प्रणाली, उन्नत कूलिंग तकनीक तथा बाजार आधारित बिजली एवं जल मूल्य निर्धारण जैसी नीतियां अपनाई जानी चाहिए।
  • इसके साथ ही, बड़े तटीय हाइपर-स्केल केंद्रों के बजाय छोटे क्षेत्रीय और हरित ऊर्जा आधारित डेटा हब विकसित करने पर भी विचार किया जा सकता है।

निष्कर्ष

  • AI क्रांति वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास को नई दिशा दे रही है, लेकिन इसके लिए आवश्यक डेटा सेंटरों की पर्यावरणीय लागत भी लगातार सामने आ रही है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह AI अवसंरचना के विस्तार और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करते हुए सतत एवं जिम्मेदार तकनीकी विकास का मार्ग अपनाए।